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बिना गुरु का साधक

note : be careful it is a real story of someone i am showing these story here for you.  so don't blame for script copy it is only for knowledge. 

बिना गुरु के ज्ञान नहीं हो सकता, लेकिन एकलव्य ने बिना गुरु के भी ज्ञान प्राप्त कर लिया था। जिससे एकलव्य एक अच्छे धनुर्धर बने थे। लेकिन एकलव्य की वो महनत वो लगन उनकी धनुर्विद्या के लिए पर्याप्त थी परन्तु तंत्र मंत्र के क्षेत्र में इस प्रकार की महनत किसी काम की नहीं। इस क्षेत्र में एक सिद्ध गुरु का होना अत्यंत आवश्यक है। गुरु के सानिध्य के बिना ये तंत्र मंत्र एक ऐसी तलवार साबित होते हैं जो खुद को ही हानि पहुंचाते हैं।









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मेरे पड़ोस में एक चाचा जी की दुकान है, उनके परिवार में वो दो भाई और उनकी पत्नी और बच्चे हैं और एक बूढ़े पिता हैं। उन्हें सब छोटे चाचा जी कहा करते हैं और उनके पिता जी जो कभी कभी दुकान पर आते हैं उनका भी सब बहुत सम्मान करते हैं। ये छोटे चाचा तो अपनी दुकान से ही अपनी रोज़ी रोटी चलाते हैं और इनके बड़े भाई एक फैक्ट्री में अच्छी पोस्ट पर कार्यरत हैं।गंगा पार शुक्लागंज में इनका अपना मकान भी है जहाँ ये सारे रहते हैं। इनकी जिंदगी सामान रूप से चल रही थी, मगर अगस्त के महीने में आने वाली नाग पंचमी ने चाचा जी के बड़े भाई की जिंदगी बदल दी।


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नागपंचमी का दिन था वेसे तो उन्हें मंदिर आना जाना ज्यादा अच्छा नहीं लगता था मगर उस दिन न जाने क्या सूझी के वो माल रोड स्थित खैरेपति मंदिर अपने एक मित्र के साथ चले गए। नागपंचमी के दिन खैरेपति मंदिर में तो जैसे सपेरो और नागो का मेल लगता है। दोनों वहां गए और तरह तरह के नाग दर्शन किये और प्रशाद वगेरह चढ़ा कर वापस आ गए। वापस आये तो काफी उत्साहित थे। उन्होंने अपनी पत्नी को बताया की वहां एक अजीब किस्म का नाग देखा जो की अत्यंत खुबसूरत और काफी बड़ा था। जब उन्होंने सपेरे से पूछा की वो कौन सा नाग है और कहाँ मिला उसे, तो सपेरे ने उन्हें बताया की उसने सर्प मोहिनी विद्या से किसी और सांप को पकड़ना चाहा था मगर ये वहां आ गया इसलिए इसे भी पकड़ लिया। चाचा जी ने उस विद्या और तंत्र मंत्र के बारे में कई सवाल पूछे मगर सपेरे ने विस्तृत जानकारी देने से मना कर दिया।







चाचा जी के मन में ये सब सीखने की लालसा जाग्रत होने लगी। उन्होंने सपेरे से अपना शिष्य बनाने का आग्रह किया मगर सपेरे ने ये कह कर टाल दिया के वो एक सांसारिक पुरुष हैं वो ऐसी वैरागी विद्या का दान उन्हें नहीं दे सकता।



इस बात का उन्हें दुख तो था मगर उनकी लालसा शांत नहीं हुयी। वो प्रति दिन किसी न किसी गुरु की तलाश में रहने लगे। कभी किसी के पास जाते तो कभी कहीं उन्हें बैठा हुआ देखा जाता था। समय और पैसा बारबाद करने लग गए थे वो कुछ लोभी उन्हें लालच देते थे तो कुछ शिष्य बना कर इनसे अपना काम निकलवाते और चलते बनते। घर में चाची जी इनसे परेशान रहने लगीं थीं। एक दिन उन्होंने अपने ससुर से ये सारी बातें बता दी और उन्हें समझाने को कहा। परिणाम स्वरुप चाचा जी की अच्छी आरती हुयी और फिर उन्होंने गुरु की तलाश और धन की व्ययता छोड़ दी और अपने सामान्य जिंदगी में वापस आ गए। लेकिन मन के किसी कोने में उनकी ये लालसा अभी भी पनप रही थी।





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कुछ दिन बीते जब सब कुछ सामान्य हो गया। एक दिन चाचा जी गर्मी की वजह से छत पर सोने गए, अचानक रात के करीब बारह बजे वो अचानक छत से सीधा नीचे आँगन में आ गिरे। आवाज़ सुनकर सब दौड़े। चाचा जी बेहोश पड़े थे सबने सोचा के कहीं कोई चोर उचक्का तो नहीं है ऊपर जिसने इन्हें मारने की कोशिश की हो। छोटे चाचा ने ऊपर जाकर देखा तो वहां कोई नहीं था सिर्फ रक्त की कुछ बूंदे पड़ी हुयी थी ऊपर चारपाई पर बिस्तर लगा हुआ था। छोटे चाचा को लगा की शायद यहाँ कोई हाथापाई हुयी है मगर उन्हें ऐसा कुछ भी न मिला फिर सोचा के शायद उन्हें चक्कर आया होगा जिससे उन्हें चोट लगी और फिर नीचे जा गिरे।



फिर वो वापस नीचे बड़े चाचा के पास गए वो अभी भी बेहोश थे उन्हें उठा कर अस्पताल ले जाया गया वहां उन्हें अगले दिन सुबह होश आया मगर वो किसी को भी पहचान नहीं पाए। घर में हाहाकार मच चुका था। किसी की कुछ समझ नहीं आ रहा था के क्या से क्या हो गया है। सिर्फ चाचा जी ही बता सकते थे और वो ही अपनी याददाश खो चुके थे। डॉक्टर ने भी किसी भी मानसिक चोट की मोजुदगी से इनकार किया। सारी रिपोर्टें सामान्य थी न कोई अघात न कोई परेशानी। केवल तेज़ धड़कन और खोयी हुयी याद्दाश के सिवा।

खैर डॉक्टर ने उन्हें घर ले जाकर आराम करने सलाह दी, सो छोटे चाचा जी ने किया। वो घर आ गए चुपचाप बस एक कमरे में पड़े रहते न किसी से कुछ बोल रहे थे न किसी से बात कर रहे थे। दिन भर तो उन्होंने आराम किया मगर जेसे ही रात के बारह बजे वो अचानक चिल्ला पड़े "माफ़ करदो दुबारा नहीं होगा। हे बाबा माफ़ करदो।"

अब छोटे चाचा और उनके पिता जी जान सांसत में आ गयी के ये क्या हो रहा है। उन्होंने बहुत पूछा के कौन बाबा? किस्से माफ़ी मांग रहे हो? मगर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया और फिर बेहोश हो गए। छोटे चाचा और उनके पिता जी उन्हें वैसा ही सोता छोड़ इस बात के बारे में बात करने लगे और सोचने लगे की क्या किया जाए?

उन्हें कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था, हाँ मगर एक बात साफ़ हो गयी थी के ये कोई उपरी चक्कर था। इसलिए अब वैसा ही डॉक्टर ढूंडना था। एक दो दिन ऐसे ही गुज़रे सारे दिन चाचा जी आराम से रहते और रात को माफ़ी मांगने लगते। और इस तरह से चिल्लाते जेसे कोई उन्हें मार रहा हो।

तीसरा दिन था, चाचा जी की दुकान पर एक साधू आया "बेटा, हम उज्जैन से हरिद्वार की यात्रा पर हैं, अपनी हस्ती के हिसाब से कुछ दान दे दो।"

"अरे बाबा माफ़ करो यार, मेरी वेसे ही हालत ख़राब है आपको क्या दान दूंगा?" चाचा जी ने माफ़ी मांगते हुए साधू से कहा।



"जैसी तुम्हारी इच्छा बेटा, लेकिन एक काम करो यहाँ गंगा किनारे हमारे गुरु जी ने कुछ दिनों के लिए विश्राम शिविर लगाया है। चाहो तो बड़े भाई को वहां ले आओ। ठीक हो जायेगा।" साधू ने शांत भाव से कहा।

चाचा जी की आँखें चौड़ी हो गयी, फिर सोचा शायद आप पास किसी ने बताया होगा और फिर कुछ पैसे निकाल बाबा के पात्र में डालने लगे। मगर बाबा ने अपना पात्र हटा लिया। और कहा "नहीं बेटा, हम तो वैरागी लोग हैं हमे सिर्फ थोडा सा अनाज दे दो।" चाचा जी ने कुछ चावल बिना तोले एक थेली डाल कर दे दिए। वो साधू आशीर्वाद देता हुए चला गया। फिर चाचा जी ने अपने घर पिता जी को फ़ोन किया और सारी बार बताई। उन्हें तो जेसे उम्मीद की एक रौशनी दिखाई दी। चाचा जी शाम से पहले ही अपनी दुकान बंद करके घर पहुंचे और फिर दान के लिए कुछ वस्तुएं ली, कुछ फल और थोडा अनाज। फिर वो दोनों बड़े चाचा जी को लेकर उसी विश्राम शिविर में पहुँच गए। चाचा जी को वो साधू वहीँ मिले और फिर चाचा जी को बैठाया। पानी वगेरह से ठीक उसी तरह सेवा की गयी जेसा की भारत की संस्कृति में मेहमानों को भगवान् मान कर की जाती रही है।

फिर उन साधू ने चाचा जी के पिता जी के साथ बड़े चाचा जी और छोटे चाचा जी को अपने गुरु से मिलवाया। चाचा जी के अनुसार उनके गुरु देखने से ही कोई सच्चे साधू लग रहे थे।पर्वत जेसी जटा, चमकता ललाट, मुख पर तेज़, वाणी में सोम्यता और अतिथि के प्रति उतना ही सत्कार। वो चाचा जी लोग के सामने ऊँचे स्थान से उतर कर उन्ही के बराबर में जमीन पर बैठ गए। और खैरियत वगेरह पूछी। चाचा जी ने सारा वृतांत उन्हें सुना दिया।

सब कुछ अच्छी तरह सुनने के बाद उन्होंने चाचा जी के पिता जी से कहा "जो कुछ ये हुआ ये तो नादानी से हुआ है। आप बस इतना कीजियेगा के आज तो शनिवार है, सोमवार को सेतु (पुल) के नीचे एक दीया, एक जोड़ी खड़ाऊ, एक लंगोट, एक चिलम और कुछ फूल और सफ़ेद बर्फी लेकर चढ़ा देना। और माफ़ी मांगते हुए कहना के महाराज ये तो एक नासमझ बालक है इससे जो भी गलती हुयी है क्षमा कर दीजिये और अपना भोग लेकर हम पर कृपा कीजिये। ऐसा ये दुबारा नहीं करेगा। और ये काम सिर्फ आप करना अपने लड़के को मत भेजना ठीक है? और कोई कितनी भी आवाज़ दे पीछे मुड़कर मत देखना न आते वक़्त ना जाते वक़्त।"

"बाबा, आपकी बात समझ तो आ गयी मगर ऐसा क्या हुआ है इसके साथ? इससे इसी कौन सी गलती हो गयी?" चाचा जी के पिता ने हाथ जोड़ कर साधू महाराज से पूछा।

"बालक बुद्धि है, एक किताब से पढ़कर बड़ी शक्ति को रक्त भोग दे कर सिद्ध करना चाह रहा था वो भी गंगा किनारे। न अपनी कोई सुरक्षा की और न ही घटवार शक्ति की आज्ञा ली। वो शक्ति तो इसके पास नहीं आई लेकिन घटवार ने इस चेष्टा के लिए इसे दंड दिया है। इसलिए क्षमा मांग कर जब ये ठीक हो जाए तो इसे समझा देना के ऐसा न करे।" साधू बाबा ने सोम्यता के साथ ये बात समझाई।

सारी बार समझ चुके थे, दोनों ने साधू बाबा को प्रणाम किया और दान में जो वास्तु लाये थे दे दी, अब सो पहले बड़े चाचा जी को उसी वक़्त गंगा स्नान करवाया और घर ले गए। अगले ही सोमवार को चाचा जी के पिता जी ने घटवार बाबा से क्षमा याचना की। शाम होते होते बड़े चाचा जी ठीक हो गए। करीब एक हफ्ते के अन्दर अन्दर वो सामान्य हो गए और अपनी नोकरी पर जाने लगे। सब कुछ सामान्य होने के बाद चाचा के पिता जी ने उनकी इस बाद पिछली से ज्यादा अच्छी आरती उतारी और उनकी तंत्र मंत्र की सिद्धि की किताब लेकर फैंक दी।









साधू बाबा अपने शिष्यों के साथ अगले दिन ही वापस अपनी यात्रा पर चल पड़े थे। चाचा जी और उनके परिवार में से किसी को भी उनसे दुबारा मिलने का मौका नहीं मिला। वो तो सिर्फ एक रूप में ईश्वर की तरह आये थे चाचा जी की समस्या का समाधान करने।

तो दोस्तों, पढ़ कर सिर्फ सांसारिक ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है अध्यात्मिक और तंत्र मंत्र का ज्ञान गुरु के बिना संभव नहीं है। इसलिए कहा गया है "गुरु बिन ज्ञान कहाँ।"




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