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my home A real Experience part 1

अपनी तंत्र शिक्षा मात्र दस साल की उम्र से ही शुरू की थी, तंत्र और मंत्र का उनका तरीका सबसे अनूठा था, जैसा की मैंने आज तक नहीं किसी और को उस तरह नहीं देखा। उन्होंने कभी किसी को अपना शिष्य नहीं चुना और न ही कभी किसी का भला करने के बदले एक रूपए तक नहीं लिए। रिक्शा चलाके वो अपनी जरूरतों को पूरा करते थे और उनकी पत्नी और बच्चे गाँव में रहते थे। जिनसे मिलने वो खुद जाया करते थे उन्हें कभी कानपुर नहीं बुलाया था उन्होंने।
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उसकी वजह थी उनका घर। दोस्तों कानपुर से बाहर जाजमऊ की तरफ जाते वक़्त एक जगह पड़ती है जो की पेड पौधों से भरी हुयी है और वहां एक सूखा सा नाला पड़ता है जिसे लोग गंगू बाबा का नाला कहते हैं। उसे कानपुर की सबसे खतरनाक जगह माना जाता है। उसकी वजह यह है की जमाने से वहां अक्सर लाशें पायी जाती रही हैं। अब ये सिलसिला थोडा कम हुआ है मगर फिर भी वहां अक्सर लाशें मिलती हैं। कुछ आत्माओ का शिकार होते हैं तो कुछ गुंडे बदमाशों का और उनकी लाशो को अक्सर वही पर ठिकाने लगा दिया जाता था। दिन के वक़्त भी वहां कोई भी भटकना पसंद नहीं करता और रात का सन्नाटा तो सीधा सीधा मौत की निमंत्रण है।

वही नाले से कुछ दूर करीब दो सौ मीटर की दुरी पर ही उन्होंने अपनी एक छोटी सी झोपडी बना रखी थी।
वहां शायद उनके जैसा ही व्यक्ति रह सकता था क्योकि उनकी मृत्यु के बाद वहां कोई भी रहने वाला नहीं बचा और न ही कोई आजतक वहां रहता है।

अब मैं आप लोगों को उनके नाम से अवगत करवाता हूँ। उन्हें लोग रिष्ट बाबा के नाम से जानते थे। ये उनका असली नाम नहीं था दरअसल जब वह करीब उन्नीस साल के थे तब एक अंग्रेज हिन्दुस्तान आया। उस वक़्त हिन्दुस्तान आज़ाद हुए कई साल बीत चुके थे मगर वो अंग्रेज़ ब्रिटेन से अपनी किसी परेशानी को लेकर हिन्दुस्तान बाबा के गुरु से मिलने आया था। क्योकि उनके गुरु आज़ादी से पहले कई अंग्रेजो के संपर्क में रहा करते थे और उन्होंने भी रिष्ट बाबा को ही अपना शिष्य चुना था और किसी को नहीं। उस अंग्रेज़ को बाबा के गुरु तो नहीं मिले लेकिन बाबा ने उसकी समस्या का समाधान किया। उसे अपने निवास स्थान को लेकर कोई समस्या थी ब्रिटेन में लेकिन जब बाबा ने उसकी समस्या का समाधान यही से कर दिया तो उसने खुश होकर बाबा को एक सोने की हाथ घड़ी उपहार दी, जिसे वो बिलकुल भी स्वीकार नहीं कर रहे थे मगर उसने उनके गुरु और अपने आज़ादी से पहले वहां रहने वाले पुरखो की निशानी के रूप में उन्हें वो घडी दी जिसे उन्हें स्वीकार करना पड़ा। ये बात बहुत प्रचलित हुई एक बाबा को सोने की रिष्ट वाच दी गयी थी।

ये वाच अब उनकी पहचान बन गयी पहले रिष्ट वाच वाले बाबा तो बाद में घडी वाले और उसके बाद रिष्ट बाबा नाम से उनका लोगो ने नाम प्रचलित कर दिया था जो की मरते दम तक इसी नाम से पहचाने जाते रहे।

ये घटना करीब इक्कीस साल पहले की है। मेरे मामा जी बहुत ही सोम्य स्वाभाव के व्यक्ति के जिसके कारण रिष्ट बाबा और मामा जी के अच्छी खासी दोस्ती थी। उसके बावजूद मामा जी ने कभी उनसे कोई मदद नहीं मांगी थी बस अच्छा व्यवहार था दोनों के बीच। जिसकी वजह से रिष्ट बाबा अक्सर अपने अनुभव उनसे बांटा करते थे। और मामा जी को भी उनके अनुभव सुनने के सदैव उत्सुक रहते थे। अब मामा जी हमे उनके अनुभव अक्सर सुनाते रहते हैं।

जब मैं छोटा था तो मुझे सर्दी बहुत लग जाया करती थी और में खाना पीना भी छोड़ दिया करता था। उस वक़्त मेरी उम्र करीब डेढ़ साल थी। मेरी सेहत में जैसे ही सुधार होने लगता था वैसे ही दुबारा मुझे सर्दी और निमोनिया हो जाता और मेरी सेहत फिर से गिर जाती थी। दिल्ली में कई डॉक्टरों को दिखाने के बाद भी मुझमे ये परेशानी बरक़रार रही। जिसकी वजह से मम्मी अक्सर परेशान रहा करती थीं। जब मम्मी मुझे लेकर एक बार कानपुर आयीं तो उस वक़्त भी मुझे सर्दी की परेशानी थी। मामा जी ने वहां के मिलिट्री हॉस्पिटल के डॉक्टरों को दिखाया मगर वही सिलसिला शुरू रहा। दवा लेकर मैं ठीक हो जाता मगर फिर वही परेशानी शुरू हो जाती। एक महीने में जब मुझे दो बार निमोनिया हो गया तो फिर ये मामा जी के लिए भी चिंता का सबब बन गया। डॉक्टर पर डॉक्टर बदलते रहे मगर जेसा हाल दिल्ली में था वैसा ही यहाँ भी बना रहा। एक दिन जब रिष्ट बाबा मामा जी से मिलने घर आये तब उन्होंने मुझे देखा और मामा जी ने उन्हें मेरी कोई परेशानी नहीं बतायी। मगर उन्होंने शायद मेरी परेशानी को भांप लिया था। उन्होंने मामा जी से शाम के वक़्त मुझे लेके उनकी झोपडी पर आने को कहा।

शाम होते ही मामा जी और मेरी मम्मी मुझे लेकर उनकी झोपडी पर गए। वहां पहले से ही एक आदमी और एक औरत अपनी बेटी को लेकर आये हुए थे। उनकी बेटी उम्र यही कोई उन्नीस बीस के आस पास थी। रिष्ट बाबा अपनी झोपडी के बहार एक चारपाई पर बैठे हुए थे। पास में उनके एक छोटी सी बाँस से बुनी हुयी टोकरी रखी थी और एक छोटा सा स्टूल रखा था। मामा जी बताते हैं के वो अपनी लगभग आधे से ज्यादा शक्तियों को इसी स्टूल पर ही भोग देते थे।

रिष्ट बाबा ने चारपाई के पास एक तरफ दो चारपाई और बिछा रखी थी। जिसपर एक पर वो व्यक्ति और उनकी पत्नी बैठी थी और दुसरे पर बाबा ने मामा जी और मम्मी को मुझे लेकर बैठने को कह दिया। और फिर बाबा ने अपनी चारपाई के आगे एक चटाई बिछायी। फिर वो अपनी चारपाई पर बैठ गए। फिर उन्होंने उन दंपति के साथ आई उस लड़की को अपने आगे पड़ी चटाई पर आकर बैठने को कहा। लेकिन वो अपनी जगह से नहीं उठी और अपने पिता को जोर से पकड़ कर बैठ गयी। उसके माता पिता ने कई बार उसे वहां बैठने को कहा और जोर दिया मगर वो उठने को राज़ी ही न हुयी। फिर बाबा ने उसके पिता को जोर जबरदस्ती करने को मना कर दिया।
फिर बाबा ने उस लड़की की तरफ ध्यान से देखा। वो लड़की भी एकटक बाबा को घूरे जा रही थी जैसे मौका मिलते ही हमला कर देगी।
थोड़ी देर देखने बाद बाबा ने उस लड़की से कहा "क्यों भाई, हमारे पास नहीं आओगे? सामने आओ तो जरा हम भी देखें कौन सी चीज़ हो तुम।"

फिर बाबा ने दूसरी और जिस तरफ गंगू बाबा का नाला और झाड़ियाँ थी उस तरफ देखा और एस लगा जैसे उन्होंने किसी को इशारे कुछ कहा हो। फिर वो दुबारा उस लड़की की तरफ देखने लगे, अचानक लड़की गिरती लड़खड़ाती सीधा आकार बाबा के सामने जमीं पर बिछी चटाई पर बैठ गयी। और गुस्से में सर झटकने लगी।

बाबा बोले "बोल कौन है तू?"

लड़की की आवाज़ में थोडा भारीपन आ चुका था और वो बोली "बहुत बड़े बाबा हो तो खुद ही जान लो।"

बाबा- "क्या गलती हुयी बच्ची से? क्यों परेशान कर रखा है इसे?"

लड़की पूरी तरह खामोश हो गयी गयी। बाबा ने कई बार पूछा मगर कुछ नहीं बोली और आखें बंद करके बैठ गयी। बाबा ने थोड़ी देर तो पूछा और फिर वो शांत होकर कुछ मंत्र पढने लगे और अपनी बाँस की टोकरी से एक लकड़ी का टुकड़ा निकाला। देखने में वो टुकड़ा चन्दन की पालिश की हुयी लकड़ी का लग रहा था। उन्होंने उस टुकड़े पर कुछ ऊँगली से बनाया और फिर उसे अपने कान के पास लगा कर बैठ गए जैसे के हम आजकल मोबाइल का इस्तेमाल सुनने के लिए करते हैं। थोड़ी देर उन्होंने उसे अपने कान के पास लगाये रखा और फिर उसके बाद वापस अपनी टोकरी में रख दिया।

to be continued ...... 
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