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MY Home A real experience part 3

 part 3
मम्मी मुझे लेकर उस चटाई पर बैठ गयीं। मैं उस वक़्त सोया हुआ था, बाबा ने मुझे देखा और कहा "बड़ा छलावा खेलते हो। जरा इधर तो देखो।"

मामा जी बताते हैं की बाबा के इतना कहने पर ही मैं नींद से जाग गया और बाबा की तरफ देखने लगा। मम्मी इस बात से हैरान हो गयीं की इतना छोटा बच्चा कैसे इतनी आसानी से बाबा की बात समझ रहा है। बाबा ने अब मेरी तरफ कुछ देर तक बड़े ही ध्यान से देखा। फिर अपनी वही चन्दन जेसी लकड़ी को उठाया और उस पर न जाने क्या ऊँगली से बनाने लगे और फिर उसे कान के पास लगाया।
थोड़ी देर इसे ही रहने के बाद उन्होंने मम्मी से पूछा "छः महीने हो गए इसे ये परेशानी होते होते। जेसे ही थोड़ी सेहत ठीक होती है फिर से बीमार पड़ जाता है।"

मम्मी ने बाबा की बात का उत्तर हाँ में दिया।

बाबा फिर बोले "बेटी, ससुराल में तुम्हारे घर के सामने कोई नीम का पेड है?"

मम्मी "नहीं बाबा, नीम का तो नहीं है शहतूत का है।"

बाबा ने फिर थोड़ी देर सोचा और फिर से उस लकड़ी को कान में लगाया। फिर से बोले "नहीं बिटिया, नीम का पेड है ध्यान से याद करके बताओ।"

मम्मी ने थोडा सोचा और फिर से बताया की नहीं बाबा वहां घर के सामने सिर्फ शेहतूत का ही पेड है।

बाबा ने इस बार वो लकड़ी का टुकड़ा कान में लगाया और बोले "सही सही पता करके बता वरना कुछ नहीं मिलेगा।"

फिर बाबा थोड़ी देर मौन रहे आँखें बंद करके। उसके बाद जब आखें खोली तो कहने लगे "बिटिया, तुम्हारे घर के आगे सड़क है उसके बाद एक पार्क बना हुआ है?"

मम्मी "हाँ बाबा।"

बाबा "उस पार्क में शेहतूत का जो पेड है वो तुम्हारे घर के बिलकुल सामने पड़ता है न ?"

मम्मी "हाँ बाबा। एक दम सामने ही है।"

बाबा "बिटिया उसी पार्क में तुम्हारे घर की सिधान पर पार्क के दूसरी तरफ एक नीम का पेड़ है। बोलो सही है?"

मम्मी "हाँ बाबा बिलकुल सही है।"

बाबा "वो पेड जिसके घर के सामने है वो औरत किसी को भी उस पेड की पूजा नहीं करने देती। इसलिए उस पर शैतान का वास हो गया है। पिछली बार जब तुम इस बच्चे को लेकर यहाँ से अपनी ससुराल गयी थी तो उस रस्ते से गुजरी थी न?"

मम्मी "हाँ बाबा गुज़रे थे हम, क्योकि दुसरी तरफ सड़क पर खुदाई हुयी थी।"

बाबा "बिटिया वो शैतान तभी से इसे चपेट करता है। जिससे ये बार बार बीमार पड़ता है और खुद ठीक होकर फिर बीमार पड़ जाता है।"

मम्मी "तो फिर बाबा इसका कोई उपाए बताईये। ये कैसे ठीक होगा।"

बाबा "बिटिया अब ये ठीक रहेगा। इसके ऊपर जो था वो किनारे बैठा है।" बाबा ने झाड़ियों की तरफ इशारा करके बताया।

बाबा "समधियाने से मेहमान आयें हैं इनकी तो खातिरदारी अच्छे से करेंगे।"

हमारी भाषा में बेटी या बेटे की ससुराल को समधियाना कहा जाता है।

इसके बाद बाबा ने मम्मी वापस चारपाई पर बैठने को कहा और एक सिगरेट सुलगा कर पास के स्टूल पर रख दी। देखते ही देखते वो सिगरेट मात्र १ मिनट में पूरी की पूरी ख़त्म हो गयी। जब मामा जी ने इसके बारे में पूछा तो बाबा ने बताया की जमादार से काम करवाया था तो ये उसकी का भोग था जो उसने ले लिया।

उसके बाद मामा जी ने पूछा "बाबा आज ये जो देखा हमने, पीपल और नीम दोनों पर प्रेत आत्माएं थी। मगर इन पेड़ो की तो पूजा भी होती है। तो ये कैसे पता चलेगा की कौन सा पेड पूजने लायक है और कौन सा नहीं?"

बाबा ने जो बताया "बेटा, नीम पीपल और बरगद ऐसे पेड होते हैं जिनपर आसानी से शक्तियां वास करने लगती हैं। जब ये पेड छोटे होते हैं तो इनपर किसी का वास नहीं होता। तब अगर इन पेड़ो की पूजा की जाए तो ये पूजने लायक पेड हो जाते हैं और इनपर कोई बुरी शक्ति वास नहीं कर पाती। लेकिन अगर इन पेड़ो को हज़ार पत्तियाँ आने तक पूजा न जाये तो फिर इनपर बुरी शक्तियां वास करने लगती हैं और फिर ये पेड कभी पूजने लायक नहीं हो पाते। इसलिए जो पेड छोटेपन से न पूजे गए हों उनकी पूजा कभी मत करना। और बेटा अगर इसे पेड़ो को कभी हटाना हो तो हज़ार पत्तियां आने से पहले ही हटा देना चाहिए वरना इस पर अगर किसी का वास हो गया तो हटाने पर वो तुम्हारे पीछे लग जायेगा। "

बाबा की बताई बातों को आज भी मामा जी हमे बताते हैं। और उनकी सिखाई बातों का पालन भी करते हैं।

रिष्ट बाबा एक सच्चे साधक महा पुरुष थे। वो अपनी चन्दन की लकड़ी के जरिये अपनी शक्तियों से बात करा करते थे जेसा मैंने आज तक किसी और साधक को करते नहीं देखा। और पूछने पर व्यंगात्मक तरीके से कहा करते थे "ये तो हमारा टेलीफोन है बिना तार का।" सच कहूँ तो आज जब में मोबाइल चलता हूँ तो अक्सर उनकी याद आ जाती है। उन्हें मैंने काफी वृद्ध अवस्था में देखा था लेकिन वो मरते दम तक कभी भी किसी के मोहताज नहीं हुए। आत्म निर्भर रहे और वेसे ही शरीर का भी त्याग किया।

अठत्तर वर्ष की उम्र में भी वो रिक्शा चलाते थे और नवरात्रों में नौ दिन का व्रत भी रखते थे। एक बार मामा जी ने उनसे ये बात पूछी थी की नौ दिन का व्रत होते हुए भी वो रिक्शा कैसे चला लेते है?

बाबा ने बताया था की रिक्शा वो नहीं चलते वो तो उनका सेवक 'जमादार' चलाता है। वो तो बस उस पर नियत्रण रखते हैं। मामा जी ये भी बताते हैं की बाबा को अक्सर गंगू बाबा के नाले के मरे हुए लोग आकर मिलते थे। जिनमे से कई को वो अपनी सेना में शामिल करते थे तो कई को वापस भगा देते थे। उनकी इस शक्ति सेना में कानपुर के इतिहास में शामिल अग्रेज भी थे जिन्हें भोग में सिर्फ इंग्लिश शराब ही बाबा दिया करते थे। उनकी ये सेना किसी भी शक्ति से टक्कर लेने में और हराने सक्षम थी। उन्होंने इन सब की वजह से जिंदगी में बहुत से कष्ट भी झेले थे जो शायद किसी आम इन्सान के बस के बाहर है। इसलिए उन्होंने कभी किसी को अपना शिष्य नहीं बनाया।