part 2
अब बाबा ने लड़की के पिता को आगे बुलाया और कहा की इसके बाल खोल दो।
जैसा बाबा ने बोल उन्होंने वैसा ही किया।
बाबा ने अब फिर से पूछना शुरू किया "कौन हो तुम?"
अभी भी कोई जवाब नहीं।
बाबा ने अब थोडा कड़क आवाज़ में पूछा "खुद बोलता है या बुलवाऊ?"
लड़की बोली लेकिन थोडा मरदाना आवाज़ की गूंज थी उसके गले में "बरम हूँ मैं।"
"क्यों परेशान कर रखा है इस बच्ची को?" बाबा ने पूछा।
"मैंने इसे कोई परेशानी नहीं दी है। ये मुझको अच्छी लगी बस इसलिए मैं इसके साथ हूँ।" उसने जवाब दिया।
"ह्म्म. अब जरा इसके माता पिता को तो बता की तूने इसे कहाँ देखा जो इसके पीछे लग गया?" बाबा ने लड़की के माता पिता की तरफ इशारा करते हुए कहा।
लड़की ने माँ बाप की तरफ देखा और कहने लगी की "ये मेरे पास खुद आई थी सुबह के वक़्त, नहाई हुयी सी थी, बाल खुले थे और बहुत अच्छी खुशबु आ रही थी इससे। बस तभी से मैं इसपर मोहित हो गया और इसके साथ हूँ।"
ये बात सुनकर उसके माता पिता दोनों ही दंग रह गए।
बाबा ने विनम्रता से कहा "ये मनुष्य कन्या है, इस तरह का बर्ताव तुम्हारे लिए ठीक नहीं है। जो कुछ चढ़ावा चाहिए ले लो और इस कन्या के ऊपर से अपना साया हटा लो।"
"ऐसा बिलकुल नहीं हो सकता, मुझे ये कन्या चाहिए। ये जबसे मेरे पास आना शुरू हुयी है तब से मैं इसके पीछे लगा हूँ और तुम कहते हो इसी सुन्दर कन्या को मैं चढ़ावे के लिए छोड़ दूँ।" लड़की ने अपनी जांघो पर ताल ठोकते हुए कहा जैसे के कोई पहलवान द्वन्द की चुनौती दे रहा हो।
"प्यार से कह रहे हैं, मान जाओ। तुम्हारी भी इज्ज़त रह जाए और हमारी भी।" बाबा ने फिर से आग्रह किया।
"नहीं। हम बरम हैं। हम यूँ ही अपनी बात से नहीं पलट जाते।" लड़की ने फिर से बाबा को चुनौती पूर्ण रूप में जवाब दिया।
"नहीं मानोगे?" बाबा ने आखिरी बार जेसे पूछा हो। और उसने भी सर हिल कर ना में जवाब दिया।
फिर बाबा ने उधर दूसरी झाड़ियों की तरफ देख कर कहा "जमादार, देख बरम बाबा आये हैं। ज़रा खातिरदारी कर तो। फालतू में बच्ची को परेशान कर रखा है।"
अचनाक लड़की उछल सी पड़ी मगर चटाई से बहार नहीं जा पाई और बडबडाने लगी "हम बरम हैं इससे कहो अपनी झाड़ू पीछे रखे। मना करो इसे मना करो। आः आअह.... " उसकी आवाज़ से एस लगने लगा की जेसे उसे मार रहा हो।
वो लगातार ये रटे जा रहा था की हम बरम हैं इस गंदे को मुझसे दूर करो। मगर बाबा ने कोई नरमी नहीं दिखाई। करीब पांच मिनट उसके चिल्लाने के बाद बाबा ने फिर से कहा "जमादार ठीक से, अच्छे से सेवा कर एक सिगरेट पिलायेंगे हम तुझे।"
करीब पंद्रह मिनट के बाद बाबा ने रुकने को कहा उसका चिल्लाना कम हो गया मगर कराह अभी भी बाकि थी। फिर बाबा ने कहा "अब जान गए मैं कौन हूँ?"
उसने अब हाथ जोड़े और कहा "बाबा मुझे बस भोग देदो मैं चला जाऊंगा।"
"नहीं, अब तो तुम्हे एक शक्कर का दाना भी नहीं मिलेगा। पहले जब आराम से तुमसे पूछा था तो हमको बता रहे थे की हम बरम हैं। अभी तो तुम्हारी और सेवा होगी तभी तुम जाओगे।" बाबा ने आराम से उसे उसकी गलती याद दिलाई और आगे जमादार से अपना काम फिर करने को कह दिया।
उसका फिर चिल्लाना और खुद बचाना शुरू हो गया मगर सब कुछ उस चटाई की ऊपर ही उससे बहार उसका कोई अंग नहीं गया था।
बाबा ने फिर उसकी सेवा रुकवाई और पूछा "बताओ अब क्या इरादा है? छोड़ोगे इस बच्ची को या नहीं?"
"बाबा जो कहोगे वही करूँगा मगर मेरी जगह मुझसे मत छिनना।" उसने हाथ जोड़कर बाबा से कहा।
बाबा - "दुबारा इस बच्ची को परेशान करोगे?"
वो - नहीं।
बाबा - " ये तुम्हारी जगह पर बार बार आयेगी तब भी?"
वो - "तब भी कभी परेशान नहीं करूँगा।"
बाबा - "ये वहां बैठे खेले कुछ भी करे इसकी तरफ देखने की हिम्मत करोगे?"
वो - "कभी नहीं।"
बाबा - "चाहे ये वहां पर किसी भी वक़्त आये जाए और चाहे उस जगह पर पेशाब भी करे। कभी छुओगे इसे?"
वो - "कभी नहीं बाबा कभी नहीं। अब हमे जाने दो।"
अब बाबा थोड़ी देर शांत रहे और वो लड़की तब तक हाथ जोड़कर बैठी रही। उसके बाद वो अचानक गिर गयी। बाबा ने उसके माता पिता को उसे उठाने को कहा। उन्होंने उसे उठा कर चारपाई पर लिटा दिया।
अब बाबा ने उसके माता पिता से पूछा की "इसे क्यों इसे पीपल पर जल चढाने ले गए थे जिसकी कभी कोई पूजा नहीं हुयी थी?"
परेशान सी उसकी माँ ने जवाब दिया "बाबा जी, हमे पंडित ने बताया था की हमारी बेटी मंगली है जिससे अगर हम इसकी शादी करेंगे तो इसके विधवा होने का खतरा है। और इस निवारण का उपाय था की मेरी बेटी किसी पीपल के पेड पर हर सोमवार और शनिवार को जल चढ़ा कर उसकी परिक्रमा करे। इसी वजह से हम उसे सुबह नेहेलवा कर पीपल पर जल चढ़वाने ले जाते थे। हमने अगल सुनसान जगह का पेड इसलिए चुना था क्योकि अगर हम वहीँ अपने घर के पास वाले पेड पर जहाँ सब पूजा करते हैं, वहां ले जाते तो सबको मालूम पड़ जाता की मेरी बेटी मंगली है और फिर उसके रिश्ते में अडचने आने लगती।"
बाबा ने सब ध्यान से सुना और फिर कहा की "इस बच्ची को एक बार गंगा स्नान करवा देना और आगे से इस तरह की गलती करने से बचना।"
अब उस लड़की को होश आ चुका था। बाबा ने उससे उसकी हालचाल पूछी। फिर उसके घरवालो के बारे में। इससे उन्होंने ये सुनिश्चित कर लिया की अब वो पूरी तरह ठीक है और उस बरम की छाया का उसके दिमाग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है।
ये सारी बात गुज़र जाने के बाद बाबा जी ने मेरी ओर देखा। फिर मेरी मम्मी को मुझे गोद में लेकर सामने उस चटाई पर बैठने को कहा।
जैसा बाबा ने बोल उन्होंने वैसा ही किया।
बाबा ने अब फिर से पूछना शुरू किया "कौन हो तुम?"
अभी भी कोई जवाब नहीं।
बाबा ने अब थोडा कड़क आवाज़ में पूछा "खुद बोलता है या बुलवाऊ?"
लड़की बोली लेकिन थोडा मरदाना आवाज़ की गूंज थी उसके गले में "बरम हूँ मैं।"
"क्यों परेशान कर रखा है इस बच्ची को?" बाबा ने पूछा।
"मैंने इसे कोई परेशानी नहीं दी है। ये मुझको अच्छी लगी बस इसलिए मैं इसके साथ हूँ।" उसने जवाब दिया।
"ह्म्म. अब जरा इसके माता पिता को तो बता की तूने इसे कहाँ देखा जो इसके पीछे लग गया?" बाबा ने लड़की के माता पिता की तरफ इशारा करते हुए कहा।
लड़की ने माँ बाप की तरफ देखा और कहने लगी की "ये मेरे पास खुद आई थी सुबह के वक़्त, नहाई हुयी सी थी, बाल खुले थे और बहुत अच्छी खुशबु आ रही थी इससे। बस तभी से मैं इसपर मोहित हो गया और इसके साथ हूँ।"
ये बात सुनकर उसके माता पिता दोनों ही दंग रह गए।
बाबा ने विनम्रता से कहा "ये मनुष्य कन्या है, इस तरह का बर्ताव तुम्हारे लिए ठीक नहीं है। जो कुछ चढ़ावा चाहिए ले लो और इस कन्या के ऊपर से अपना साया हटा लो।"
"ऐसा बिलकुल नहीं हो सकता, मुझे ये कन्या चाहिए। ये जबसे मेरे पास आना शुरू हुयी है तब से मैं इसके पीछे लगा हूँ और तुम कहते हो इसी सुन्दर कन्या को मैं चढ़ावे के लिए छोड़ दूँ।" लड़की ने अपनी जांघो पर ताल ठोकते हुए कहा जैसे के कोई पहलवान द्वन्द की चुनौती दे रहा हो।
"प्यार से कह रहे हैं, मान जाओ। तुम्हारी भी इज्ज़त रह जाए और हमारी भी।" बाबा ने फिर से आग्रह किया।
"नहीं। हम बरम हैं। हम यूँ ही अपनी बात से नहीं पलट जाते।" लड़की ने फिर से बाबा को चुनौती पूर्ण रूप में जवाब दिया।
"नहीं मानोगे?" बाबा ने आखिरी बार जेसे पूछा हो। और उसने भी सर हिल कर ना में जवाब दिया।
फिर बाबा ने उधर दूसरी झाड़ियों की तरफ देख कर कहा "जमादार, देख बरम बाबा आये हैं। ज़रा खातिरदारी कर तो। फालतू में बच्ची को परेशान कर रखा है।"
अचनाक लड़की उछल सी पड़ी मगर चटाई से बहार नहीं जा पाई और बडबडाने लगी "हम बरम हैं इससे कहो अपनी झाड़ू पीछे रखे। मना करो इसे मना करो। आः आअह.... " उसकी आवाज़ से एस लगने लगा की जेसे उसे मार रहा हो।
वो लगातार ये रटे जा रहा था की हम बरम हैं इस गंदे को मुझसे दूर करो। मगर बाबा ने कोई नरमी नहीं दिखाई। करीब पांच मिनट उसके चिल्लाने के बाद बाबा ने फिर से कहा "जमादार ठीक से, अच्छे से सेवा कर एक सिगरेट पिलायेंगे हम तुझे।"
करीब पंद्रह मिनट के बाद बाबा ने रुकने को कहा उसका चिल्लाना कम हो गया मगर कराह अभी भी बाकि थी। फिर बाबा ने कहा "अब जान गए मैं कौन हूँ?"
उसने अब हाथ जोड़े और कहा "बाबा मुझे बस भोग देदो मैं चला जाऊंगा।"
"नहीं, अब तो तुम्हे एक शक्कर का दाना भी नहीं मिलेगा। पहले जब आराम से तुमसे पूछा था तो हमको बता रहे थे की हम बरम हैं। अभी तो तुम्हारी और सेवा होगी तभी तुम जाओगे।" बाबा ने आराम से उसे उसकी गलती याद दिलाई और आगे जमादार से अपना काम फिर करने को कह दिया।
उसका फिर चिल्लाना और खुद बचाना शुरू हो गया मगर सब कुछ उस चटाई की ऊपर ही उससे बहार उसका कोई अंग नहीं गया था।
बाबा ने फिर उसकी सेवा रुकवाई और पूछा "बताओ अब क्या इरादा है? छोड़ोगे इस बच्ची को या नहीं?"
"बाबा जो कहोगे वही करूँगा मगर मेरी जगह मुझसे मत छिनना।" उसने हाथ जोड़कर बाबा से कहा।
बाबा - "दुबारा इस बच्ची को परेशान करोगे?"
वो - नहीं।
बाबा - " ये तुम्हारी जगह पर बार बार आयेगी तब भी?"
वो - "तब भी कभी परेशान नहीं करूँगा।"
बाबा - "ये वहां बैठे खेले कुछ भी करे इसकी तरफ देखने की हिम्मत करोगे?"
वो - "कभी नहीं।"
बाबा - "चाहे ये वहां पर किसी भी वक़्त आये जाए और चाहे उस जगह पर पेशाब भी करे। कभी छुओगे इसे?"
वो - "कभी नहीं बाबा कभी नहीं। अब हमे जाने दो।"
अब बाबा थोड़ी देर शांत रहे और वो लड़की तब तक हाथ जोड़कर बैठी रही। उसके बाद वो अचानक गिर गयी। बाबा ने उसके माता पिता को उसे उठाने को कहा। उन्होंने उसे उठा कर चारपाई पर लिटा दिया।
अब बाबा ने उसके माता पिता से पूछा की "इसे क्यों इसे पीपल पर जल चढाने ले गए थे जिसकी कभी कोई पूजा नहीं हुयी थी?"
परेशान सी उसकी माँ ने जवाब दिया "बाबा जी, हमे पंडित ने बताया था की हमारी बेटी मंगली है जिससे अगर हम इसकी शादी करेंगे तो इसके विधवा होने का खतरा है। और इस निवारण का उपाय था की मेरी बेटी किसी पीपल के पेड पर हर सोमवार और शनिवार को जल चढ़ा कर उसकी परिक्रमा करे। इसी वजह से हम उसे सुबह नेहेलवा कर पीपल पर जल चढ़वाने ले जाते थे। हमने अगल सुनसान जगह का पेड इसलिए चुना था क्योकि अगर हम वहीँ अपने घर के पास वाले पेड पर जहाँ सब पूजा करते हैं, वहां ले जाते तो सबको मालूम पड़ जाता की मेरी बेटी मंगली है और फिर उसके रिश्ते में अडचने आने लगती।"
बाबा ने सब ध्यान से सुना और फिर कहा की "इस बच्ची को एक बार गंगा स्नान करवा देना और आगे से इस तरह की गलती करने से बचना।"
अब उस लड़की को होश आ चुका था। बाबा ने उससे उसकी हालचाल पूछी। फिर उसके घरवालो के बारे में। इससे उन्होंने ये सुनिश्चित कर लिया की अब वो पूरी तरह ठीक है और उस बरम की छाया का उसके दिमाग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है।
ये सारी बात गुज़र जाने के बाद बाबा जी ने मेरी ओर देखा। फिर मेरी मम्मी को मुझे गोद में लेकर सामने उस चटाई पर बैठने को कहा।
to be continued.....
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